इम्फाल, 23 जुलाई: मणिपुर विश्वविद्यालय ने एक और महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर मैबम बिद्यानंदा का चयन प्रतिष्ठित फुलब्राइट-नेहरू अकादमिक एवं प्रोफेशनल एक्सीलेंस फेलोशिप 2026-27 के लिए किया गया है।
यूनाइटेड स्टेट्स-इंडिया एजुकेशनल फाउंडेशन (USIEF) द्वारा 9 जुलाई 2026 को जारी आधिकारिक पत्र के अनुसार, प्रो. बिद्यानंदा 26 अक्टूबर 2026 से अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन में आठ महीने का शोध कार्यक्रम संचालित करेंगे। भारत और अमेरिका के बीच शैक्षणिक सहयोग को बढ़ावा देने वाली यह फेलोशिप विश्व की सबसे प्रतिष्ठित अकादमिक विनिमय योजनाओं में से एक मानी जाती है।
प्रो. बिद्यानंदा का चयन उनकी उत्कृष्ट शैक्षणिक उपलब्धियों के साथ-साथ प्रतिस्पर्धी शोध परियोजनाओं में उनके उल्लेखनीय योगदान का भी प्रमाण है। पिछले दो दशकों में उन्होंने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) सहित विभिन्न राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा वित्तपोषित कई महत्वपूर्ण शोध परियोजनाओं का नेतृत्व किया है। उनके शोध कार्यों ने शिलांग मैसिफ, मेघालय और असम के प्रीकैम्ब्रियन भू-भाग, इंडो-म्यांमार ओफियोलाइट बेल्ट तथा अरुणाचल हिमालय के प्राचीन भूवैज्ञानिक विकास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
वर्ष 2001 में जादवपुर विश्वविद्यालय से मिनरलॉजी में पीएच.डी. प्राप्त करने वाले प्रो. बिद्यानंदा ने फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी, अहमदाबाद, जर्मनी के यूनिवर्सिटी ऑफ माइंज और यूनिवर्सिटी ऑफ बॉन तथा ऑस्ट्रेलिया के मैक्वेरी विश्वविद्यालय में प्रतिष्ठित शोध फेलोशिप और विजिटिंग रिसर्च नियुक्तियों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।
वे हिमालयी भू-पर्पटी (क्रस्ट) के विकास, मणिपुर और नागा ओफियोलाइट तथा पूर्वोत्तर भारत के भूविज्ञान पर अनेक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्र प्रकाशित कर चुके हैं। साथ ही, उन्होंने मणिपुर विश्वविद्यालय में पृथ्वी विज्ञान विभागाध्यक्ष और प्रॉक्टर सहित कई महत्वपूर्ण शैक्षणिक एवं प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभाई हैं।
प्रो. मैबम बिद्यानंदा का फुलब्राइट-नेहरू फेलोशिप के लिए चयन उनके उत्कृष्ट शोध, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शैक्षणिक नेतृत्व की एक और बड़ी उपलब्धि है। यह सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि मणिपुर विश्वविद्यालय की उन्नत पृथ्वी विज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा को भी नई पहचान दिलाता है।