इंफाल, 25 सितंबर 2026: मणिपुर विश्वविद्यालय ने मणिपुर और पूर्वोत्तर भारत के जलमार्गों, नदी संस्कृति, आजीविका और पर्यावरणीय चुनौतियों पर केंद्रित पुस्तक ‘Waterways and Riverine Culture of Manipur & North East India’ का विमोचन किया। इस पुस्तक में नदियों और जलमार्गों से जुड़े ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा पारिस्थितिक पहलुओं पर शोधपरक लेख शामिल हैं।
पुस्तक का विमोचन मणिपुर विश्वविद्यालय के कुलपति न्यायालय सभागार (वीसी कोर्ट हॉल) में आयोजित कार्यक्रम के दौरान किया गया। इसका संपादन प्रो. हंजाबम इस्वोरचंद्र शर्मा, प्रो. सुखदेबा शर्मा हनिजाबम और पेबम नगांथोइबा मंगांग ने किया है। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग और कॉलेज विकास परिषद ने इंटेलेक्चुअल फोरम ऑफ नॉर्थ ईस्ट–मणिपुर के सहयोग से किया।
मणिपुर विधानसभा के अध्यक्ष थोकचोम सत्यब्रत सिंह कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। मणिपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आर.के. हेमाकुमार सिंह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की, जबकि मणिपुर सरकार के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन निदेशक डॉ. टी. ब्रजाकुमार सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय की डीन प्रो. मेमचा लोइतोंगबाम ने मुख्य वक्तव्य दिया।
13 शोध लेखों में समाहित हैं नदी और जलमार्ग से जुड़े विविध विषय
कार्यक्रम में स्वागत भाषण देते हुए विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख प्रो. दामोदर नेप्राम ने बताया कि पुस्तक में कुल 13 लेख शामिल हैं। इनमें मणिपुर और पूर्वोत्तर भारत की नदी प्रणालियों, प्राचीन जलमार्गों, नदी आधारित संस्कृति, आजीविका तथा समुदायों और नदियों के बीच संबंधों पर चर्चा की गई है।
उन्होंने कहा कि नदियों ने क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति और अर्थव्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और इस विषय में रुचि रखने वाले अन्य लोगों के लिए उपयोगी संदर्भ सामग्री साबित हो सकती है।
मुख्य वक्तव्य में प्रो. मेमचा लोइतोंगबाम ने कहा कि नदियों को केवल जल प्रवाह के माध्यम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे आजीविका का स्रोत, संचार का मार्ग, सामुदायिक स्मृतियों की वाहक, सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा और विभिन्न समुदायों को जोड़ने वाली कड़ी भी हैं।
उन्होंने इम्फाल, इरिल, थोउबल, नांबुल, सेक्माई और खुग्गा नदियों के साथ बराक नदी प्रणाली तथा लोकटक झील का उल्लेख करते हुए कहा कि मणिपुर के जलस्रोत मत्स्य पालन, कृषि, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की आजीविका से गहराई से जुड़े हुए हैं। ऐतिहासिक रूप से इन जलमार्गों ने पहाड़ी क्षेत्रों, घाटियों, गांवों और कस्बों के बीच लोगों, वस्तुओं और विचारों के आदान-प्रदान को संभव बनाया है।
नदियों के संरक्षण में पारंपरिक ज्ञान की अहम भूमिका
प्रो. मेमचा ने कहा कि नदियों और आर्द्रभूमियों के आसपास रहने वाले समुदायों ने जलस्तर में मौसमी बदलाव, मछली पकड़ने, कृषि, जलीय पौधों, बाढ़ और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन से संबंधित महत्वपूर्ण पारंपरिक ज्ञान विकसित किया है। यह ज्ञान हमेशा औपचारिक शैक्षणिक साहित्य में दर्ज नहीं होता, लेकिन क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने प्रदूषण, कचरा निपटान, अतिक्रमण, भूमि उपयोग में बदलाव और कटाव को नदियों तथा आर्द्रभूमियों के लिए बढ़ते खतरे के रूप में रेखांकित किया। उनके अनुसार, इन समस्याओं का संबंध केवल पर्यावरण से नहीं, बल्कि आजीविका, सामाजिक असमानता, पारंपरिक व्यवसायों, संस्कृति और सामाजिक बदलाव से भी है।
उन्होंने नदियों के संरक्षण के लिए विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों के बीच सहयोग, अंतर्विषयक अनुसंधान और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को आवश्यक बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विकास योजनाओं में पारिस्थितिक तंत्र का सम्मान किया जाना चाहिए और आधुनिक विज्ञान को स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान से सीख लेनी चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण के लिए शोध और नीतियों में समन्वय जरूरी
विशिष्ट अतिथि डॉ. टी. ब्रजाकुमार सिंह ने पुस्तक के संपादकों और योगदानकर्ताओं को बधाई देते हुए कहा कि यह प्रकाशन पर्यावरण, संस्कृति और समाज के आपसी संबंधों का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।
उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है, ताकि उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सके। मणिपुर की संस्कृति और समुदायों का नदी प्रणालियों से ऐतिहासिक जुड़ाव रहा है। इसलिए जलमार्गों का संरक्षण राज्य की पारिस्थितिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा से भी जुड़ा है।
डॉ. ब्रजाकुमार ने शहरीकरण, कचरे और मानवीय गतिविधियों के कारण नदियों पर बढ़ते दबाव का उल्लेख करते हुए नांबुल नदी की स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि नदी पुनर्जीवन के प्रयास केवल किसी एक नदी तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि मणिपुर के समग्र जलमार्गों के संरक्षण और प्राकृतिक जल प्रवाह को बनाए रखने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा होने चाहिए।
उन्होंने पर्यावरण संबंधी नीतियों को वैज्ञानिक अध्ययनों, तथ्यात्मक आंकड़ों और विशेषज्ञों के शोध पर आधारित बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही, उन्होंने स्थानीय पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए मणिपुर की वास्तविक परिस्थितियों पर केंद्रित शोध करने तथा पारंपरिक और स्वदेशी ज्ञान को व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकृत करने का आह्वान किया।
पुस्तक में तीन प्रमुख विषयगत खंड
पुस्तक का परिचय देते हुए संपादक प्रो. हंजाबम इस्वोरचंद्र शर्मा ने बताया कि इसका विचार 27 और 28 दिसंबर 2024 को आयोजित एक अंतर्विषयक संगोष्ठी से विकसित हुआ। उन्होंने इसे पर्यावरण अध्ययन, भूगोल, इतिहास, लोककथाओं, साहित्य, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और संस्कृति को एक साथ जोड़ने वाला प्रयास बताया।
उन्होंने जानकारी दी कि पुस्तक के 13 लेखों को तीन व्यापक विषयगत क्षेत्रों में व्यवस्थित किया गया है। पहले खंड में मणिपुर की नदी प्रणाली, जलयान और नदी आधारित संस्कृति पर चर्चा की गई है। दूसरा खंड मणिपुर में नौवहन, आजीविका और पर्यावरण पर केंद्रित है, जिसमें नाव निर्माण, नदी परिवहन, बदलते नदी पारिस्थितिकी तंत्र तथा लोकटक झील के आसपास के जलस्रोतों और आजीविका से जुड़े विषय शामिल हैं।
तीसरा विषयगत क्षेत्र पूर्वोत्तर भारत के अंतर्देशीय जलमार्गों और संपर्क व्यवस्था, पारंपरिक अर्थव्यवस्था एवं पर्यावरण तथा ब्रह्मपुत्र नदी के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर केंद्रित है।
शोध को व्यावहारिक समाधान में बदलने की जरूरत
मुख्य अतिथि थोकचोम सत्यब्रत सिंह ने पुस्तक के प्रकाशन के लिए संपादकों, लेखकों और आयोजकों को बधाई दी। उन्होंने नदियों और पर्यावरण की बदलती स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अकादमिक शोध को समस्याओं की पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान तलाशने पर भी ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शोध निष्कर्ष और शैक्षणिक विमर्श नीति निर्माण तथा उसके प्रभावी क्रियान्वयन में योगदान दे सकते हैं। नदियों, वनस्पतियों और वर्षा के स्वरूप में हो रहे बदलावों का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता और सामूहिक जिम्मेदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. आर.के. हेमाकुमार सिंह ने भी नदियों और आसपास के पर्यावरण के संरक्षण को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका भी इसमें अहम है। नदियों और उनके आसपास के क्षेत्रों को कचरे से मुक्त रखना इस दिशा में जरूरी कदम है।
उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक जलमार्गों, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के बीच संबंधों पर आगे शोध, आत्ममंथन और व्यापक चर्चा को प्रोत्साहित करेगी।
कार्यक्रम के दौरान पुस्तक के अध्यायों में योगदान देने वाले लेखकों और मणिपुर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के प्रमुखों को इसकी प्रतियां भेंट की गईं। इंटेलेक्चुअल फोरम ऑफ नॉर्थ ईस्ट–मणिपुर के डॉ. पेबम नगांथोइबा मंगांग ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
पुस्तक के विमोचन से मणिपुर और पूर्वोत्तर भारत में नदियों, जलमार्गों, स्थानीय आजीविका, सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरणीय स्थिरता से जुड़े विषयों पर अकादमिक विमर्श तथा जन-जागरूकता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।