इंफाल, 08 जुलाई: मणिपुर विश्वविद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने मणिपुर से मीठे पानी की मसल की दो नई प्रजातियों की खोज की है। यह खोज राज्य की जलीय जैव विविधता, वर्गीकरण विज्ञान और विकासवादी इतिहास को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान मानी जा रही है।
यह शोध डॉ. याम्बेम तेंजिंग सिंह, प्रो. नाओरेम मोहिलाल मेइतेई, समिता सोरोखैबम देवी और डॉ. बीना लौक्राकपम द्वारा किया गया। अध्ययन में मणिपुर की मीठे पानी की मसल विविधता का दस्तावेजीकरण एक समेकित वर्गीकरण पद्धति के माध्यम से किया गया, जिसमें आकारिकी परीक्षणों के साथ डीएनए आधारित विश्लेषण को शामिल किया गया।
शोध में Parreysiinae उपकुल से संबंधित छह मीठे पानी की मसल प्रजातियों की पहचान की गई। ये प्रजातियां चार वंशों, Indonaia, Lamellidens, Parreysia और Radiatula, के अंतर्गत आती हैं। इनमें से दो प्रजातियों को विज्ञान के लिए नई प्रजातियों के रूप में वर्णित किया गया है। इनके नाम Indonaia manipurensis sp. nov. और Parreysia imphalensis sp. nov. रखे गए हैं।
अध्ययन में मणिपुर की स्थानिक मसल प्रजाति Radiatula theobaldi की वर्गीकरण स्थिति को भी स्पष्ट किया गया। इसके लिए नए अनुक्रमित टोपोटाइप नमूनों का उपयोग किया गया। इससे इंडो-म्यांमार क्षेत्र में मीठे पानी की मसल प्रजातियों की विविधता, वर्गीकरण और विकासवादी संबंधों पर नई वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त हुई है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, मणिपुर की मीठे पानी की मसल जीव संपदा स्थानिक और बाहरी मूल की unionid प्रजातियों का एक विशिष्ट समूह है। यह विविधता प्राचीन भूवैज्ञानिक और जैव-भौगोलिक प्रक्रियाओं से प्रभावित रही है, जिनमें भारतीय प्लेट और बर्मा टेरेन की मीठे पानी की प्रणालियों के बीच ऐतिहासिक संबंध भी शामिल हैं।
अध्ययन में समय-आधारित वंशावली पुनर्निर्माण के माध्यम से यह भी सामने आया कि इन प्रजातियों का विकास व्यापक भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं से जुड़ा हुआ है। इनके विभाजन का समय क्रेटेशियस काल तक जाता है, जबकि Parreysiinae की उत्पत्ति गोंडवाना के विघटन से संबंधित मानी गई है। क्रेटेशियस से मियोसीन काल के बीच हुए प्रसार और विभाजन की घटनाओं ने इनकी वर्तमान भौगोलिक उपस्थिति को आकार दिया।
शोधकर्ताओं ने मीठे पानी की मसल Lamellidens generosus के mantle cavity में रहने वाली जलीय जोंक Hemiclepsis myanmariana को भी दर्ज किया। यह मणिपुर के मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र में एक महत्वपूर्ण host-symbiont संबंध को दर्शाता है।
मीठे पानी की मसल प्रजातियां पारिस्थितिकी की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। ये पानी को छानने, पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखने और मीठे पानी के आवासों के पारिस्थितिक स्वास्थ्य को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। इस कारण इन्हें freshwater ecosystem engineers भी माना जाता है।
अध्ययन में यह भी बताया गया कि लाखों वर्षों में विकसित हुई यह विशिष्ट जैव विविधता अब मानवीय गतिविधियों के कारण बढ़ते संकट का सामना कर रही है। आवास विखंडन, प्रदूषण और अत्यधिक दोहन जैसी समस्याएं इन प्रजातियों और उनके प्राकृतिक आवासों के लिए गंभीर खतरा बन रही हैं।
शोधकर्ताओं ने मणिपुर में मीठे पानी की मसल प्रजातियों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए मजबूत उपायों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इन प्रजातियों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और संरक्षण क्षेत्र के मीठे पानी के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
इस शोध के निष्कर्ष दो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त peer-reviewed journals में प्रकाशित हुए हैं। एक शोध पत्र Biological Journal of the Linnean Society में 2026 में प्रकाशित हुआ, जिसे Oxford University Press, United Kingdom द्वारा प्रकाशित किया जाता है। दूसरा शोध पत्र Ecologica Montenegrina में 2025 में प्रकाशित हुआ, जिसे Institute for Biodiversity and Ecology, Montenegro द्वारा प्रकाशित किया जाता है।
Indonaia manipurensis और Parreysia imphalensis की खोज से मणिपुर की वैज्ञानिक महत्ता और बढ़ी है। यह खोज राज्य को समृद्ध मीठे पानी की जैव विविधता वाले क्षेत्र के रूप में स्थापित करती है और इंडो-म्यांमार क्षेत्र के विकासवादी इतिहास और जैव-भौगोलिक अध्ययन के लिए मूल्यवान जानकारी प्रदान करती है।