इंफाल, 7 अगस्त 2026: मणिपुर यूनिवर्सिटी के मानवशास्त्र विभाग ने शुक्रवार को South Asian Anthropologist (SAAN) के विशेष अंक “Unsettling Manipur: Conflict, Displacement and Despair” का विमोचन किया। विशेष अंक में मणिपुर में जारी संकट के विभिन्न पहलुओं पर तथ्य एवं साक्ष्य आधारित अकादमिक शोध प्रस्तुत किए गए हैं।
जर्नल का विमोचन मानवशास्त्र विभाग के कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित कार्यक्रम में किया गया। इस अवसर पर मणिपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति (प्रभारी) प्रो. आर.के. हेमकुमार सिंह, स्कूल ऑफ ह्यूमन एंड एनवायरनमेंटल साइंसेज के डीन प्रो. एम.सी. अरुणकुमार, रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल के चेयरमैन प्रो. एस. जिबोनकुमार सिंह, मानवशास्त्र विभाग के प्रमुख प्रो. हाओबिजाम वोकेन्द्र सिंह, शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति (प्रभारी) प्रो. आर.के. हेमकुमार सिंह ने कहा कि जटिल सामाजिक मुद्दों को समझने में मदद करने वाले वस्तुनिष्ठ अकादमिक शोध तैयार करना विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने मणिपुर में जारी संकट पर केंद्रित इस समयानुकूल विशेष अंक के प्रकाशन के लिए मानवशास्त्र विभाग की सराहना की और उम्मीद जताई कि इसमें शामिल शोध राज्य से बाहर भी सूचित अकादमिक विमर्श को बढ़ावा देंगे।
मुख्य वक्तव्य देते हुए मानवशास्त्र विभाग के प्रमुख प्रो. हाओबिजाम वोकेन्द्र सिंह ने कहा कि विशेष अंक का उद्देश्य मणिपुर से जुड़े विमर्श को अटकलों और गलत सूचनाओं से हटाकर साक्ष्य आधारित अकादमिक अध्ययन की ओर ले जाना है।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया नैरेटिव और AI-जनित सामग्री के बढ़ते प्रभाव के दौर में यह अंक काल्पनिक या अनुमान आधारित सामग्री के बजाय अनुभवजन्य निष्कर्षों पर आधारित एक गंभीर अकादमिक प्रयास है। उन्होंने इस प्रकाशन को एक “लाइटहाउस” बताते हुए कहा कि इसमें सावधानीपूर्वक चयनित शोध के माध्यम से विश्वसनीय ज्ञान और अपुष्ट कथनों के बीच अंतर स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।
प्रो. वोकेन्द्र सिंह के अनुसार, विशेष अंक में मणिपुर के जातीय संघर्ष से संबंधित मीडिया नैरेटिव, वर्ष 2015 से 2024 तक के आंकड़ों के पूर्वव्यापी विश्लेषण के आधार पर मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल लोगों की जनसांख्यिकीय प्रोफाइल तथा आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (IDPs) की मनोवैज्ञानिक और शारीरिक स्वास्थ्य स्थितियों से जुड़े अध्ययन शामिल हैं।
एक शोधपत्र में यह अध्ययन किया गया है कि मीडिया के कुछ वर्गों द्वारा घटनाओं को चयनित तरीके से प्रस्तुत किए जाने से जनधारणा किस प्रकार प्रभावित हो सकती है। वहीं, एक अन्य अध्ययन में मादक पदार्थों से संबंधित गिरफ्तारियों के दस वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण कर जनसांख्यिकीय पैटर्न को समझने का प्रयास किया गया है।
एक अन्य शोध में आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों और गैर-विस्थापित लोगों के तनाव स्तर तथा स्वास्थ्य संकेतकों की तुलना की गई है। इसके निष्कर्ष मनोवैज्ञानिकों और स्वास्थ्य पेशेवरों को उपयुक्त हस्तक्षेप की योजना बनाने में मदद कर सकते हैं।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो. एम.सी. अरुणकुमार ने कहा कि यह प्रकाशन प्रतिस्पर्धी नैरेटिव और अटकलों के बजाय वैज्ञानिक एवं साक्ष्य आधारित दृष्टिकोण से मणिपुर की मौजूदा स्थिति का अध्ययन करने के शुरुआती संगठित अकादमिक प्रयासों में से एक है। उन्होंने कहा कि इन अध्ययनों से संकट के कारणों, प्रभावों और दीर्घकालिक परिणामों पर अंतर-विषयक शोध के नए रास्ते खुल सकते हैं।
रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल के चेयरमैन प्रो. एस. जिबोनकुमार सिंह ने बताया कि South Asian Anthropologist का प्रकाशन पहली बार 1980 में हुआ था और यह भारत की सबसे पुराने मानवशास्त्र संबंधी जर्नलों में से एक है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों का दायित्व केवल ज्ञान का संरक्षण करना नहीं, बल्कि समाज के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों पर अकादमिक ईमानदारी, वैज्ञानिक कठोरता और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता के साथ शोध तैयार करना भी है।
वक्ताओं ने कहा कि लंबे समय से जारी संकट ने मणिपुर के लोगों पर सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर गहरा प्रभाव डाला है। उन्होंने उम्मीद जताई कि विशेष अंक समसामयिक चुनौतियों पर अधिक सूचित सार्वजनिक विमर्श को बढ़ावा देगा और मणिपुर से जुड़े मुद्दों पर आगे के साक्ष्य आधारित शोध को प्रोत्साहित करेगा।