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इम्फाल, 15 मई: मणिपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग द्वारा गुरुवार को विभागीय परिसर में अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस (International Day of Families) मनाया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश, बढ़ते व्यक्तिवाद और परिवार की बदलती संरचनाओं के बीच परिवार संस्था के महत्व को रेखांकित करना था।
कार्यक्रम की शुरुआत विश्वविद्यालय गीत के साथ हुई, जिसके बाद अतिथियों का पारंपरिक लेंगयान भेंट कर स्वागत किया गया। समारोह की अध्यक्षता समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. एम. लिली ने की, जबकि मणिपुर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज की डीन प्रो. एल. मेमचा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं।
अपने संबोधन में प्रो. एल. मेमचा ने परिवार की स्थायी और महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा, “घर वहीं है जहाँ परिवार है।” उन्होंने कहा कि बदलते समय में भी परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई बना हुआ है और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण में इसकी केंद्रीय भूमिका है।
अध्यक्षीय भाषण में प्रो. एम. लिली ने समकालीन सामाजिक चुनौतियों के संदर्भ में पारिवारिक संबंधों को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सामाजिक परिवर्तन के इस दौर में परिवारों के भीतर संवाद, सहयोग और जिम्मेदारी की भावना को और सुदृढ़ करने की जरूरत है।
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण “परिवार संस्था की कमजोर होती नींव और बच्चों का धूमिल भविष्य” विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान था, जिसे मणिपुर विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. हाओबिजाम वोकेंद्र सिंह ने प्रस्तुत किया।
अपने व्याख्यान में प्रो. वोकेंद्र सिंह ने परिवार की अवधारणा के ऐतिहासिक विकास और विश्वभर में प्रचलित विभिन्न पारिवारिक संरचनाओं का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि मानव व्यवहार को आकार देने में जैविक कारकों से अधिक संस्कृति की भूमिका होती है और दुनिया के विभिन्न समाजों में बच्चों के पालन-पोषण की परंपराएं इसका प्रमाण हैं।
उन्होंने परिवार को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बताते हुए कहा कि परिवार ही नागरिकता, नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों का पहला विद्यालय है। उन्होंने वैश्विक आंकड़ों का हवाला देते हुए आय असमानता, विवाह की बढ़ती आयु, बढ़ती तलाक दर और बदलती पारिवारिक संरचनाओं के बच्चों के विकास पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा की।
प्रो. वोकेंद्र सिंह ने अस्थिर पारिवारिक वातावरण में पले-बढ़े बच्चों पर पड़ने वाले सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभावों का भी विश्लेषण किया। उन्होंने परिवार से जुड़े मूल्यों, जिम्मेदारियों और सामाजिक प्रतिबद्धताओं को संरक्षित रखने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं तथा आमंत्रित अतिथि बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन, सामूहिक छायाचित्र और अल्पाहार के साथ हुआ।
समाजशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम परिवार संस्था की बदलती चुनौतियों और समकालीन समाज में उसकी प्रासंगिकता पर गंभीर चिंतन का महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ।

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