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इंफाल, 24 अगस्त 2026: मणिपुर यूनिवर्सिटी में सोमवार को “उत्तर-पूर्व भारत में जातीय संघर्ष, भूमि, संसाधन और विकास” विषय पर छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम शुरू हुआ। कार्यक्रम में विभिन्न विषयों के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इसमें संघर्ष, पहचान, भूमि, जनसांख्यिकीय बदलाव, शासन, शांति निर्माण और सतत विकास जैसे मुद्दों पर विशेष रूप से मणिपुर के संदर्भ में चर्चा की जा रही है।
यह कार्यक्रम मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र (MMTTC), मणिपुर यूनिवर्सिटी द्वारा शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के तहत आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम 24 से 29 अगस्त 2026 तक विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र विभाग के कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित किया जा रहा है।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में मणिपुर यूनिवर्सिटी के कार्यवाहक कुलपति प्रो. आर.के. हेमकुमार सिंह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। स्कूल ऑफ ह्यूमन एंड एनवायरनमेंटल साइंसेज के डीन प्रो. एम.सी. अरुणकुमार और मानवशास्त्र विभाग के प्रमुख प्रो. हाओबिजाम वोकेन्द्रो सिंह सम्मानित अतिथि रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता MMTTC-MU के निदेशक प्रो. आर.के. भुबोन सिंह ने की।
अकादमिक विमर्श को संरक्षित करने पर जोर
अपने संबोधन में प्रो. आर.के. हेमकुमार सिंह ने कार्यक्रम के विषय को वर्तमान परिस्थितियों में अत्यंत प्रासंगिक बताया। उन्होंने कहा कि छह दिवसीय कार्यक्रम मणिपुर और पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के सामने मौजूद चुनौतियों पर विशेषज्ञों के बीच गंभीर अकादमिक चर्चा के लिए महत्वपूर्ण मंच प्रदान करेगा।
उन्होंने कहा कि मणिपुर करीब तीन वर्षों से लंबे संकट का सामना कर रहा है। ऐसे में अकादमिक चर्चाओं के निष्कर्षों को भविष्य के संदर्भ के लिए सुरक्षित रखना जरूरी है। उन्होंने आयोजकों और संसाधन व्यक्तियों से चर्चाओं की एक संक्षिप्त रिपोर्ट तैयार करने तथा कार्यवाही को विश्वविद्यालय पुस्तकालय में संरक्षित करने का आग्रह किया। संभव होने पर इसे ऑनलाइन उपलब्ध कराने की भी बात कही गई।
सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़ने की जरूरत
MMTTC-MU के निदेशक प्रो. आर.के. भुबोन सिंह ने कहा कि यह कार्यक्रम पूर्वोत्तर में जारी जातीय तनाव और पहचान, भूमि, संसाधन, शासन तथा विकास के बीच जटिल संबंधों की पृष्ठभूमि में तैयार किया गया है।
उन्होंने मणिपुर में जारी हिंसा के संदर्भ में ऐतिहासिक शिकायतों, भूमि और राजनीतिक स्थान को लेकर परस्पर दावों, सामाजिक-आर्थिक असमानताओं, उग्रवाद, शासन संबंधी कमियों और सीमा-पार गतिविधियों को गंभीर अकादमिक अध्ययन की आवश्यकता वाले मुद्दों के रूप में रेखांकित किया।
प्रो. भुबोन सिंह ने कहा कि जातीय संघर्ष का स्थायी समाधान केवल सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके लिए शांति निर्माण, मेल-मिलाप, समान विकास, प्रभावी शासन और विभिन्न समुदायों की पहचान व अनुभवों के सम्मान पर भी ध्यान देना होगा।
उन्होंने बताया कि छह दिवसीय कार्यक्रम में प्रस्तुत किए जाने वाले शोध-पत्रों को संकलित कर पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की योजना है, ताकि इन अकादमिक चर्चाओं को शोधकर्ताओं और आने वाली पीढ़ियों के लिए संदर्भ सामग्री के रूप में उपलब्ध कराया जा सके।
भूमि, पहचान और विकास पर व्यापक चर्चा
प्रो. एम.सी. अरुणकुमार ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में शिक्षकों को शिक्षा प्रक्रिया के केंद्र में रखा गया है और इसलिए शिक्षकों के लिए अपने ज्ञान, कौशल और समझ को लगातार अद्यतन करना आवश्यक है।
उन्होंने प्रतिभागियों से जातीयता, जातीय संघर्ष, स्वदेशी समुदाय, स्थानीय समुदाय, भूमि अधिकार और विकास जैसे विषयों पर आलोचनात्मक ढंग से विचार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अकादमिक संस्थानों की जिम्मेदारी है कि राजनीतिक विमर्श में इस्तेमाल होने वाली अवधारणाओं और प्रमाण-आधारित अकादमिक समझ के बीच अंतर स्पष्ट किया जाए।
मानवशास्त्र विभाग के प्रमुख प्रो. हाओबिजाम वोकेन्द्रो सिंह ने बताया कि कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है और उन्हें अपनी विशेषज्ञता के अनुसार व्यापक विषयों के भीतर स्वतंत्र रूप से विषय चुनने का अवसर दिया गया है। कार्यक्रम में भूमि, सीमा सुरक्षा, जनसांख्यिकीय बदलाव, संघवाद, जातीय संबंध, शासन, इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और मणिपुर के विभिन्न समुदायों के बीच संबंधों जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी।
छह दिनों में विभिन्न विषयों पर प्रस्तुतियां
कार्यक्रम के दौरान विद्वान, विशेषज्ञ, पत्रकार और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े पेशेवर जातीय संघर्ष, विस्थापन, जनसांख्यिकीय बदलाव, भूमि एवं प्राकृतिक संसाधन, सीमा सुरक्षा, शासन, संघवाद, इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और शांति निर्माण जैसे विषयों पर प्रस्तुतियां देंगे।
24 अगस्त को डॉ. एल. मुहिंद्रो आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों की स्थिति और जातीय संघर्ष पर प्रस्तुति देंगे, जबकि प्रो. रेना लैस्राम उत्तर-पूर्व भारत में शांति निर्माण में इतिहास की भूमिका पर चर्चा करेंगी। डॉ. थ. भारत संघर्ष और विस्थापन पर प्रस्तुति देंगे।
25 अगस्त को पत्रकार प्रदीप फंजौबम मणिपुर में जातीय हिंसा के कारणों और परिणामों तथा आगे की राह पर बोलेंगे। इसके अलावा मोरेह और भारत की एक्ट ईस्ट नीति, असममित शक्ति-साझाकरण, तथा संघर्ष की परिस्थितियों में महिलाओं, युवाओं और कमजोर समूहों की भूमिका जैसे विषयों पर भी चर्चा होगी।
26 अगस्त के सत्रों में अवैध प्रवासन और जनसांख्यिकीय बदलाव, उत्तर-पूर्व भारत में भूमि-संसाधन एवं संपर्क की भू-राजनीति, जल एवं आर्द्रभूमि, पर्यावरणीय न्याय तथा मणिपुर में संघवाद और स्वायत्तता जैसे मुद्दे शामिल होंगे।
27 अगस्त को उत्तर-पूर्व भारत की रणनीतिक चुनौतियों, मणिपुर संकट और स्थायी सुरक्षा एवं शांति, पहाड़ी और घाटी के जातीय समुदायों की साझा उत्पत्ति, जनसांख्यिकीय बदलाव तथा संघर्ष परिवर्तन और शांति निर्माण पर प्रस्तुतियां होंगी।
28 अगस्त को मणिपुर की आदिवासी जनजातियों, भारत-म्यांमार संबंधों, सामुदायिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत में संग्रहालयों की भूमिका पर चर्चा होगी। कार्यक्रम में MCQ सत्र भी शामिल रहेगा।
29 अगस्त को लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) कोंसम हिमालय उत्तर-पूर्व भारत में सीमा क्षेत्र, सुरक्षा और शासन पर प्रस्तुति देंगे। इसके अलावा मणिपुर में शांति निर्माण की चुनौतियों तथा सशस्त्र संघर्ष, छोटे हथियार और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे विषयों पर चर्चा के साथ कार्यक्रम का समापन होगा।
आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम का उद्देश्य मानवशास्त्र, इतिहास, जनसांख्यिकी, अंतरराष्ट्रीय संबंध, सुरक्षा अध्ययन, पर्यावरण अध्ययन, शासन, सांस्कृतिक अध्ययन, पत्रकारिता और शांति निर्माण जैसे विभिन्न क्षेत्रों के दृष्टिकोणों को एक मंच पर लाना है। अकादमिक चर्चाओं और शोध-पत्रों के दस्तावेजीकरण से भविष्य के शोध और मणिपुर तथा पूर्वोत्तर में संघर्ष, मेल-मिलाप और सतत विकास पर informed discourse को बढ़ावा देने की उम्मीद है।

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